पुष्कर सरकार और विवादों संग मंत्रियों के 7 फेरे! मुसीबत साबित हो रहे Cabinet सहयोगी:इनको समझाना-संभालना शासन चलाने से अधिक मुश्किल

पुष्कर सरकार और विवादों संग मंत्रियों के 7 फेरे! मुसीबत साबित हो रहे Cabinet सहयोगी:इनको समझाना-संभालना शासन चलाने से अधिक मुश्किल

 

 

 

 

 

 

CM पुष्कर सिंह धामी के लिए उनके ही कुछ मंत्री सिर दर्द साबित हो रहे

पुष्कर सिंह धामी ने जब त्रिवेन्द्र सिंह रावत की अगुवाई में शुरू हुई पिछली BJP सरकार में तीरथ सिंह रावत को बाय-बाय कर CM की कुर्सी संभाली तो पार्टी तकरीबन कब्र में जा चुकी थी, और ऐसा खुद पार्टी के बड़े-बड़े चेहरे ऑफ़ दी रिकॉर्ड खूब कहते थे. उत्तराखंड में Modi Magic का ढंका-छिपा असर था फिर भी एक बार तेरी एक बार मेरी सरकार वाली BJP-Congress सरकार के रिवाज का भूत खुद पार्टी और सियासी समीक्षकों के सिर चढ़ के भीषण उछल कूद कर रहा था. High Command ने ख़तरा भांपा और उस युवा पुष्कर को सरकार का Captain बना के सभी को हैरान कर दिया, जिनको राज्यमंत्री तक बनाना TSR-1-2 को गवारा नहीं लगा. बेशक कई औसत से भी कम काबिलियत वालों को उनकी टीम में जगह मिल गई थी. पुष्कर की दौड़-धूप और मोदी-राष्ट्रवाद के  चूरण ने चमत्कार किया. पुष्कर को भले उनकी पार्टी के ही कुछ सूबेदारों ने खटीमा की जंग में दगाबाजी कर पटखनी दे दी, लेकिन अपनी कुर्बानी की कीमत पर PSD फिर से BJP को हारी हुई लड़ाई विधानसभा चुनाव में जितवा के ले आए. सब कुछ ठीक चलना चाहिए था लेकिन आज की तारीख में पुष्कर के लिए सबसे बड़ी समस्या उनके Cabinet के ही साथी बने हुए हैं.

 

 

पुष्कर को अगर मोदी-शाह-संघ की तिकड़ी ने फिर CM बनाया तो सिर्फ इसलिए कि वे इस हकीकत को भली-भांति जानते थे कि नया Chaptor लिखते हुए उत्तराखंड में पहली बार किसी किसी सरकार को लगातार दूसरी बार लाने का कमाल उन्होंने ही किया.मेरे BJP के दिल्ली वाले मित्र और सूत्रों से उत्तराखंड को ले के गाहे-बगाहे चर्चा होती रहती है. ऐसी ही चर्चा में ये संकेत मिलते रहे हैं कि पुष्कर ने दूसरी बार Cabinet के गठन में कोई दखल नहीं दिया. उन्होंने आला कमान के पूछे जाने के बावजूद मंत्रियों के चयन में कोई भूमिका निभाने से इनकार करते हुए ये कहा कि वह किसी भी मंत्री और मंत्रिमंडल से काम ले लेंगे. उनकी कोई ख़ास पसंद मंत्रियों को ले के नहीं है.

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ऐसा आम तौर पर नहीं होता है. कोई भी CM मंत्रिमंडल खुद की पसंद का चाहते हैं. ये पुष्कर का आत्मविश्वास या फिर हाई कमान पर अति भरोसा कहा जा सकता है कि उन्होंने इस मामले में सब कुछ ऊपर वालों पर छोड़ दिया. मेरी निजी तौर पर राय है कि पुष्कर के पास कम से कम 3-4 नाम ऐसे हो सकते थे, जिनको कोई और CM होता तो दुबारा मंत्री बनने का सौभाग्य शायद ही नसीब होता. ये उनका बड़प्पन भी है कि उन्होंने ऐसे चेहरों को भी अपने साथ रखने में ऐतराज नहीं किया, जो उनके लिए या तो समस्या साबित होने की पूरी आशंका रखते या फिर पार्टी के भीतर प्रतिद्वंद्विता पैदा किए हुए थे और हैं.

 

सरकार के भीतर का आलम ये है कि पुष्कर की मेहनत और भाग-दौड़ पर मंत्रियों की कारस्तानियाँ या फिर विवाद मुसीबत-कहर बन के टूट रहे. ऐसा भला कहाँ होता है कि मंत्री ही अपने स्टाफ के खिलाफ मुकदमा लिखा दे कि उसने उनके फर्जी दस्तखत का इस्तेमाल कर किसी को HoD तक बना दिया.ये बहुत बड़ा आरोप ही नहीं बल्कि सरकार के लिए भी भारी दिक्कत पैदा करने वाले आरोप हैं. ताज्जुब है कि अध्यात्मिक गुरु और भीषण सुशिक्षित-ज्ञानी-ध्यानी-Exposer वाले मंत्री समझे जाने वाले सतपाल महाराज ये नहीं समझ पा रहे हैं कि वह इस मुद्दे को जितना उछालेंगे, सरकार की पेशानी पर उतने बल पड़ेंगे.सतपाल ने परोक्ष तौर पर एक किस्म से सरकार की कमियों के साथ ही खुद की भी अपने ही मंत्रालय व अपने Office में ही कमजोर पकड़ साबित कर दी है.उनके प्रमुख सचिव रमेश कुमार सुधांशु को बहुत तेज तर्रार माना जाता है. वह भी इस मामले में गच्चा कैसे खा गए, ये भी कम हैरानी की बात नहीं है.

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वित्त और शहरी विकास-आवास-संसदीय कार्य मंत्रालय सँभालने वाले मंत्री को सदा ही आला कमान और CM के सबसे करीबियों में शुमार किया जाता है. प्रेमचंद अग्रवाल के पास ये सभी मंत्रालय हैं. स्पीकर रहते कभी बेटे की उपनल से नौकरी लगवाने और कभी ढेरों भर्तियाँ ताल ठोंक के करने व फिर उसको नियमानुसार करार दे के High Court में अपनी और सरकार की खिल्ली उड़वाने के बावजूद प्रेमचंद कुछ सीखने को राजी नहीं दिखते हैं.ऐसा कहा जा सकता है. कोई और मंत्री होता तो सहम के कुछ महीने तो खामोशी से सिर्फ 2 का पहाड़ा पढ़ के उत्तीर्ण होने लायक अंक जुटाने की फिराक में रहते. ये मंत्री जी अलग ही मिट्टी के साबित हुए.शहरी विकास में 74 विवादित तबादले कर के परदेस फुर्र हो गए. मुख्यमंत्री को भनक लगी तो रोक लगा दी गई. फिर न जाने क्या हुआ.कुछ ही हफ्ते बाद फिर 34 के करीब तबादले उसी महकमे में फिर कर दिए. वाकई मंत्री बहुत जिगर वाले हैं. ये कहा जा सकता है.

 

सहकारिता और उच्च शिक्षा में बहाली का आलम है.सहकारिता में तो भ्रष्टाचार की गूँज इस कदर रही कि कई बार सरकार घने संकट में घिरती दिखी. उच्च शिक्षा में भी कुलपतियों-रजिस्ट्रार की नियुक्तियों ने सरकार के लिए जवाब तलाशना मुश्किल कर दिया. दोनों महकमे डॉ धन सिंह रावत के पास हैं. उनको काफी दमदार-ऊपरी पकड़ वाला मंत्री माना जाता है. इसके बवजूद दोनों ही महकमों में वह बहुत कमजोर साबित हुए.

वह कांग्रेस के निशाने पर लगातार बने हुए हैं.और भी मंत्री हैं जो कम या ज्यादा सरकार के लिए दिक्कत पैदा कर रहे हैं.इनमें से किसी मंत्री का नाम विवादित चिट्ठी लिखने में आ रहा है तो कोई जमीनों-संपत्तियों से जुड़े विवादों से वास्ता रखते हैं.कुछ मंत्री तो ऐसे हैं कि उनके नाम लगातार इस नजरिये से लिए जा रहे हैं कि कभी मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ तो सबसे पहला वार उनके ऊपर ही होगा. उनके कारनामे-काण्ड-विवादों से आला कमान खुफिया विभाग और खुद CM के जरिये भी भली-भांति बावस्ता बताए जा रहे हैं.

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आला कमान और ख़ास तौर पर मोदी-शाह-संघ इस सच्चाई से वाकिफ हैं कि मुख्यमंत्री के तौर पर पुष्कर की तमाम मेहनत और पार्टी-सरकार की छवि पर कुछ मंत्री पानी फेर रहे हैं.

ऐसे में वह कुछ Tough Call भी अब ले लें तो ताज्जुब नहीं होना चाहिए,लोकसभा चुनाव-2024 में इस बार कड़ी टक्कर होने की सम्भावना है. इसमें अब अधिक वक्त नहीं रह गया है. BJP अभी से महासमर के लिए अपने अस्त्र-शस्त्र-रणनीति पर काम करने लगी है

. गुजरात का चुनाव धमाकेदार ढंग से फतह करने के बावजूद आला कमान इस पहलू को दरकिनार नहीं करेगा कि हिमाचल प्रदेश में उत्तराखंड सरीखे तथ्यों और सूरत के बावजूद BJP शिकस्त खा गई. वह भी उस Congress से, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि उसका साम्राज्य लगातार अस्त होता जा रहा है.

 



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