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जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकार को जनता के द्वार तक पहुंचाया है

 

‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ के माध्यम से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सरकार को जनता के द्वार तक पहुंचाया है

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड में सुशासन केवल नीतियों तक सीमित नहीं, बल्कि धरातल पर सशक्त रूप में दिखाई दे रहा है। ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान ने प्रशासन और नागरिक के बीच की दूरी को निर्णायक रूप से कम किया है। अब तक प्रदेशभर में आयोजित 113 बहुउद्देशीय शिविरों में 56 हजार से अधिक लोगों की भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि यह पहल जनता की वास्तविक आवश्यकताओं से जुड़ी है। 45 दिनों तक चलने वाले इस अभियान में नागरिकों को एक ही मंच पर सेवा, समाधान और संतुष्टि का अनुभव मिल रहा है—योजनाओं का लाभ, शिकायतों का निस्तारण और त्वरित निर्णय, सब कुछ मौके पर।

इसी क्रम में हाल ही में अल्मोड़ा दौरे के दौरान मुख्यमंत्री धामी का औचक निरीक्षण इस अभियान की आत्मा को और मजबूती देता है। तय कार्यक्रम से हटकर मुख्यमंत्री का काफ़िला अचानक ताड़ीखेत (अल्मोड़ा) की न्याय पंचायत जैनोली में लगे ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ बहुउद्देशीय शिविर की ओर मुड़ा—और यहीं से ग्राउंड ज़ीरो गवर्नेंस का वह दृश्य सामने आया, जिसने शासन–प्रशासन की कार्यशैली पर सीधा, साफ़ और निर्णायक संदेश दे दिया।
बिना किसी पूर्व सूचना मुख्यमंत्री सीधे शिविर पहुंचे, मुख्यसेवक स्टॉल पर बैठे और नागरिकों से आमने–सामने संवाद किया। शिकायतें सुनी गईं, फाइलें खुलीं और अधिकारियों को मौके पर त्वरित व समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। यहीं नहीं, पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज, जैनोली के जर्जर भवन की शिकायत सामने आते ही विद्यालय भवन के जीर्णोद्धार की घोषणा कर दी गई। यह महज़ निरीक्षण नहीं था—यह तत्काल निर्णय था, जिसने जनता के भरोसे को और मजबूत किया।

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यह औचक निरीक्षण स्पष्ट करता है कि यह सरकार फाइलों में नहीं, मैदान में चलती है। ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ के तहत सरकारी सेवाओं को जनता के द्वार तक पहुँचाने की पहल अब केवल योजना नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत बन चुकी है। अब नागरिकों को समस्याओं के समाधान के लिए दफ़्तरों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते—सरकार खुद उनके पास पहुँचती है। यह दौरा मुख्यमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि मुख्य सेवक के रूप में नेतृत्व का जीवंत प्रदर्शन था। औचक निरीक्षण यहाँ औपचारिकता नहीं, बल्कि जवाबदेही की कसौटी है—बिना पूर्व सूचना पहुँचना, स्टॉल पर बैठकर शिकायतें सुनना, मौके पर निर्णय लेना और वहीं समाधान सुनिश्चित करना। यही वह नेतृत्व है जो सत्ता को अधिकार नहीं, सेवा मानता है।

जब राज्य को ऐसा निर्णायक, भरोसेमंद और संवेदनशील नेतृत्व मिले—जो विकास के साथ-साथ सांस्कृतिक चेतना, सुरक्षा और सुशासन का संतुलन साधे—तो जनता को विकल्प तलाशने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कोई सामान्य प्रशासनिक अभियान नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री की दूरदर्शी और मानवीय सोच का परिणाम है—एक ऐसा मॉडल, जहाँ शासन आदेश नहीं देता, बल्कि समाधान लेकर पहुँचता है। इस पहल ने सुशासन को लाभार्थी सूची से निकालकर जीवन में उतरती वास्तविकता बना दिया है। जिनके पास आवास नहीं था, उन्हें आवास की स्वीकृति मिली; जिनकी पेंशन अटकी थी, उन्हें समय पर पेंशन मिल रही है; ब्याज अनुदान, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य, राशन, प्रमाण-पत्र—अनेक सेवाएँ मौके पर ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण यह कि समस्याएँ सिर्फ दर्ज नहीं हो रहीं, बल्कि तत्काल सुनवाई और निस्तारण के साथ भरोसे में बदल रही हैं।

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यही कारण है कि यह अभियान आज अन्य राज्यों के लिए भी एक अनुकरणीय मिसाल बनता जा रहा है—जहाँ प्रशासन जनता के सामने जवाबदेह है और सरकार सेवा का पर्याय। स्पष्ट है, धामी की यह पहल केवल योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं, बल्कि शासन की सोच में आया परिवर्तन है—और यही परिवर्तन उत्तराखंड को सुशासन की अग्रिम पंक्ति में स्थापित कर रहा है।

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